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हिंदुओं में विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन, कानून का दुरुपयोग खतरनाक: बॉम्बे हाईकोर्ट

महाराष्ट्रा- देश में तेजी से दर्ज हो रहे दहेज प्रताड़ना के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक परिवार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A के तहत दर्ज मामला खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक कलह आजकल समाज में एक खतरा बन गया है और दो व्यक्तियों के बीच छोटी-छोटी बातों पर झगड़े के कारण हिंदुओं के लिए ‘पवित्र’ विवाह की अवधारणा को धक्का लग रहा है। जस्टिस नितिन साम्ब्रे और जस्टिस महेंद्र नेर्लिकर की खंडपीठ ने महिलाओं द्वारा पति के अधिक से अधिक रिश्तेदारों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के ‘प्रवृत्ति’ पर ध्यान दिया और कहा कि वैवाहिक कलह के मामलों को ‘अलग’ नजरिए से देखने की जरूरत है।

उक्त मामले में जजों ने 8 जुलाई को पारित आदेश में कहा, “यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि पति पक्ष के कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने के हालिया चलन को देखते हुए वैवाहिक विवादों को अलग नज़रिए से देखना ज़रूरी हो गया। इसलिए यदि पक्षकार शांतिपूर्वक रहने के लिए अपने विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लेते हैं तो न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह FIR, आरोप पत्र या आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना पर विचार करके ऐसी कार्रवाई को प्रोत्साहित करे।”

न्यायालय ने कहा, “विभिन्न कारणों से आजकल वैवाहिक कलह समाज में एक खतरा बन गया। इन वैवाहिक कलह के कारण झगड़ रहे पक्षों के पास कानून में कई उपाय हैं। दोनों के बीच का छोटा-मोटा विवाद पूरी ज़िंदगी खराब कर रहा है और हिंदुओं में पवित्र माने जाने वाले विवाह खतरे में हैं। विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक मिलन है, जो दो आत्माओं को एक साथ बांधता है। हालांकि, आजकल उपरोक्त परिस्थितियों में इन विक्षिप्त विवाहों को धक्का लग रहा है। संकट, वैमनस्य और व्यक्तियों के बीच सामंजस्य की कमी संघर्ष का कारण बनती है।”

जजों ने आगे कहा कि वैवाहिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए बनाए गए कानूनों, जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम, उसका पक्षकारों द्वारा अक्सर दुरुपयोग किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मुकदमेबाजी की अधिकता हो जाती है, जिससे न केवल न्यायालय पर बोझ पड़ता है, बल्कि बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, अंतहीन संघर्ष, वित्तीय नुकसान और अपूरणीय क्षति भी होती है।

खंडपीठ ने रेखांकित किया, “ऐसे मामलों में न्यायालय को पक्षकारों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है, पक्षकारों के बीच सभी मुकदमों को समाप्त करने के लिए एक सम्मानजनक समझौते का समर्थन करना चाहिए।” इस मामले में जजों ने कहा कि पक्षकारों ने अपने विवादों को सुलझा लिया और अपने सभी विवादों को समाप्त करके अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए एक सौहार्दपूर्ण समझौते पर पहुंच गए।

जजों ने कहा, “इसलिए ऐसी स्थिति में जहां वैवाहिक बंधन आपसी सहमति से समाप्त हो चुका है। पक्षकार अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्सुक हैं। यदि आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना पर विचार नहीं किया जाता है तो यह उनके साथ अन्याय होगा। इसलिए पूर्ण न्याय करने के लिए उपरोक्त उद्धृत निर्णयों का सहारा लेकर कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना पर विचार किया जा सकता है।” जजों ने कहा कि इस मामले में शिकायतकर्ता पत्नी ने हलफनामा दायर किया और अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने पर अपनी कोई आपत्ति नहीं जताई है।

खंडपीठ ने कहा कि यह समझौता ‘वास्तविक’ था। खंडपीठ ने कहा, “इसलिए हमारे विचार में पक्षकारों को न्यायालय में घसीटने और उनके भविष्य की बेहतरी के लिए खुशी से जीने के उनके अधिकार की रक्षा करने के बजाय न्याय के हित में कार्यवाही रद्द करके उक्त कार्रवाई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यद्यपि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएं 498-ए और 377 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराएं 3 और 4 समझौता-योग्य नहीं हैं, फिर भी न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित रखने के लिए न्यायालय को यह मानना चाहिए कि धारा 320 के प्रावधान FIR, आरोप-पत्र या बाद की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के अधिकार के प्रयोग में बाधा नहीं बनेंगे।” इन टिप्पणियों के साथ खंडपीठ ने पति, उसकी माँ और दो बहनों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी।

Case Title: ARP vs State of Maharashtra (Criminal Application 900 of 2025)

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