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कोरोना किलर 2D मेड इन इंडिया आ गई दवाई अब कोरोना से फूल एंड फाइनल लड़ाई ।

DRDO की कोरोनारोधी दवा 2-डीजी से जगी उम्मीद, संभव होगा कोरोना का इलाज

इसे विकसित करने वाले विज्ञानियों के मुताबिक वायरस कोशिका से चिपकी इस दवा को ग्लूकोज समझकर खाने की कोशिश करेगा, लेकिन चूंकि यह कोई ग्लूकोज नहीं है, इसलिए इस दवा को खाने से कोरोना वायरस की मौत हो जाएगी और मरीज ठीक होने लगेगा, यही इस दवाई का मूल सिद्धांत है।

इस दवा से आक्सीजन की शरीर में कमी नहीं होगी और जिन मरीजों को आक्सीजन की जरूरत है, उन्हें भी इस दवा को देने के बाद संक्रमण की आशंका कम होगी।

अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के बीच इस दवा के तीन चरण के क्लीनिकल ट्रायल हो चुके हैं और इनके काफी सुखद परिणाम सामने आए हैं। दवा के पहले चरण का ट्रायल अप्रैल-मई 2020 में पूरा हुआ था, जिसमें लैब में ही दवा पर परीक्षण किए गए थे।

बहरहाल डीजीसीआइ के मुताबिक 2-डीजी दवा के प्रयोग से कोरोना वायरस के ग्रोथ पर प्रभावी नियंत्रण से अस्पताल में भर्ती कोरोना मरीजों के स्वास्थ्य में तेजी से रिकवरी हुई है।

चूंकि रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस दवा का उत्पादन बहुत जल्द और भारी मात्रा में देश में ही किया जाना संभव है, इसलिए कोरोना संक्रमितों के इलाज में दवा की कमी की कोई समस्या आने की संभावना नहीं रहेगी, इससे कोरोना के मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। डीआरडीओ की कोशिश है

कि यह दवा देश के प्रत्येक नागरिक को और हर स्थान पर आसानी से उपलब्ध हो सके। उम्मीद है कि अगले माह से यह गेमचेंजर दवा लागत मूल्य पर ही कोविड संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए बाजार में उपलब्ध हो जाएगी।

कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ्तार से पूरा देश त्राहिमाम कर रहा है। ऐसे में किसी ऐसी ‘संजीवनी’ की दरकार है जो इस बीमारी को नियंत्रित कर सके। ऐसे में उम्मीद की बड़ी किरण बनकर सामने आया है

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) जो न सिर्फ देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जुटा है, बल्कि कोरोना महामारी के दौर में भी निरंतर हरसंभव मदद के प्रयासों में जुटा है।

ऐसे समय में जब इसकी वैक्सीन की मांग काफी बढ़ गई हो और आपूर्ति बहुत कम हो, किसी ऐसी दवा की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है, जो प्रतिदिन कोरोना के बढ़ रहे ग्राफ को तेजी से नीचे ला सके और लाखों देशवासियों की जान बचाई जा सके।

इस नई दवा के परीक्षण में जो नतीजे सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए माना जा रहा है कि डीआरडीओ की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला नाभिकीय औषधि तथा संबद्ध विज्ञान संस्थान (आइएनएमएएस) द्वारा विकसित की गई 2-डीजी दवा कोरोना के इलाज में गेमचेंजर साबित हो सकती है।

दावा किया गया है कि इस दवा के इस्तेमाल से मरीज जल्दी ठीक हो रहे हैं। दवा नियामक ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीजीसीआइ) द्वारा डीआरडीओ की बनाई हुई कोरोना की नई दवा 2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) के आपात इस्तेमाल की मंजूरी दे दी गई है।

रक्षा मंत्रालय का इस दवा के संबंध में कहना है कि 2-डीजी के साथ जिन मरीजों का इलाज हुआ, उनमें से अधिकांश की आरटीपीसीआर रिपोर्ट नेगेटिव आई और उनमें तेजी से रोग के लक्षणों में कमी देखी गई।

मुंह के जरिये ली जाने वाली इस दवा का अब कोरोना के मध्यम से गंभीर लक्षण वाले मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह दवा पाउडर के रूप में एक पैकेट में आती है,

जिसे पानी में घोलकर मरीज को दिया जाता है। परीक्षण में डीआरडीओ की इस दवा के काफी अच्छे नतीजे सामने आए हैं और इसके क्लीनिकल ट्रायल सफल साबित हुए हैं। डीआरडीओ का दावा है कि जिन मरीजों पर इस दवा का ट्रायल किया गया, उनमें तेजी से रिकवरी देखी गई। यही नहीं, ऐसे मरीजों की आक्सीजन पर निर्भरता भी कम हो गई।

डीआरडीओ के विज्ञानियों के अनुसार यह दवा अस्पताल में भर्ती मरीजों को तेजी से ठीक होने में मदद करने के साथ-साथ अतिरिक्त आक्सीजन की निर्भरता को भी कम करती है। इसकी पुष्टि दवा के तीसरे चरण के ट्रायल में हुई है, जिसके अच्छे नतीजे आए हैं, उसी के बाद इसके इस्तेमाल की स्वीकृति दी गई है।

विज्ञानियों के अनुसार वायरस के विकास के लिए ग्लूकोज का होना जरूरी है और अगर कोरोना वायरस को शरीर में ग्लूकोज नहीं मिलेगा तो उसकी वृद्धि रूक जाएगी। संक्रमित कोशिकाओं में जमा हो जाने के बाद डीआरडीओ द्वारा विकसित नई दवा वायरल संश्लेषण तथा ऊर्जा उत्पादन कर वायरस को और बढ़ने से रोकती है।

संक्रमित कोशिका के साथ मिलकर यह एक प्रकार से सुरक्षा दीवार बना देती है, जिससे वायरस उस कोशिका के साथ ही अन्य हिस्सों में भी नहीं फैल सकेगा। डीआरडीओ के विज्ञानियों का कहना है कि किसी भी टिश्यू या वायरस के विकास के लिए ग्लूकोज जरूरी होता है, लेकिन अगर उसे ग्लूकोज नहीं मिले तो उसके मरने की उम्मीद बढ़ जाती है, इसी को मिमिक करके ग्लूकोज का एनालॉग बनाया गया।

इसे विकसित करने वाले विज्ञानियों के मुताबिक वायरस कोशिका से चिपकी इस दवा को ग्लूकोज समझकर खाने की कोशिश करेगा, लेकिन चूंकि यह कोई ग्लूकोज नहीं है, इसलिए इस दवा को खाने से कोरोना वायरस की मौत हो जाएगी

और मरीज ठीक होने लगेगा, यही इस दवाई का मूल सिद्धांत है। इस दवा से आक्सीजन की शरीर में कमी नहीं होगी और जिन मरीजों को आक्सीजन की जरूरत है, उन्हें भी इस दवा को देने के बाद संक्रमण की आशंका कम होगी।

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